Thursday, January 22, 2026

Joshimath Sinking: पौराणिक शंकराचार्य मठ में दरार, शिवलिंग खंडित, धंसा शिव मंदिर, अब नहीं बच पाएगा जोशीमठ?

जोशीमठ (Joshimath Sinking) का बचना अब मुश्किल लगने लगा है. पूरा शहर धीरे-धीरे बर्बाद हो रहा है. केंद्र और राज्य सरकार शहर को बचाने की कोशिश में पूरी ताकत लगा रही है. लेकिन शहर में दरार पड़ने का सिलसिला जारी है.

भूधंसान की चपेट में अब आदि गुरु शंकराचार्य मठस्थली

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जोशीमठ (Joshimath Sinking) में पड़ रही दरारों और भूधंसान की चपेट में अब आदि गुरु शंकराचार्य मठस्थली भी आ गई है. मठस्थली में बना हुआ शिव मंदिर करीब छह इंच जमीन में धंस गया है. इसके साथ ही यहां रखे हुए शिवलिंग में भी दरारें आ गई हैं. मंदिर के आदि शंकराचार्य का बसाया ज्योर्तिमठ का माधवाश्रम भी है. वैदिक शिक्षा व ज्ञान पाने के लिए देशभर से छात्र यहां आते हैं. फिलहाल भी यहां 60 विद्यार्थी यहां शिक्षा ले रहे हैं. आपको बता दें आदि गुरु शंकराचार्य मठस्थली के भीतर ही शिवमंदिर बना हुआ है. साल 2000 में यहां शिवलिंग जयपुर से लाकर स्थापित किया गया था.

आदि शंकराचार्य का वो कल्प वृक्ष भी मिटने की कगार पर हैं

इतना ही नहीं, जोशीमठ (Joshimath Sinking) में आदि शंकराचार्य का वो कल्प वृक्ष भी मिटने की कगार पर हैं जिसके बारे में मान्यता है कि शंकराचार्य ने यहां 2500 वर्षों पूर्व कल्प वृक्ष के नीचे गुफा के अंदर बैठकर ज्ञान की प्राप्ति की थी. मंदिर परिसर के कई भवनों, जिनमें लक्ष्मी नारायण मंदिर भी शामिल है उसके आसपास बड़ी- बड़ी दरारें पड़ गई हैं. ज्योतिर्मठ के प्रभारी ब्रह्मचारी मुकुंदानंद ने बताया कि “मठ के प्रवेश द्वार, लक्ष्मी नारायण मंदिर और सभागार में दरारें आई हैं. इसी परिसर में टोटकाचार्य गुफा, त्रिपुर सुंदरी राजराजेश्वरी मंदिर और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य की गद्दी स्थल है.”

मंदिर में विराजमान शिवलिंग भी धंस रहा है

मंदिर के पुजारी वशिष्ठ ब्रहमचारी ने जानकारी दी कि, “पिछले करीब 12-13 माह से यहां धीरे-धीरे दरारें आ रहीं थीं. मगर किसी को यह अंदाजा तक नहीं था कि हालात यहां तक पहुंच जाएंगे. पहले दरारों को सीमेंट लगाकर रोकने का प्रयास किया जा रहा था. लेकिन पिछले सात-आठ दिन में हालात बिगड़ने लगे हैं. मंदिर करीब छह से सात इंच नीचे की ओर धंस चुका है. दीवारों के बीच गैप बन गया है. मंदिर में विराजमान शिवलिंग भी धंस रहा है. पहले उस पर चंद्रमा के आकार का निशान था जो कि अब अचानक बढ़ गया है. वहीं नृसिंह मंदिर परिसर में भी फर्श धंस रहा है. मठभवन में भी दीवारों में दरारें आने लगी हैं. यह फर्श 2017 में डाला गया था, जिसकी टाइलें बैठने लगी हैं.”

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